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जोड़ों के दर्द के लिए Ayurvedic Treatment कितना असरदार है?

May 28, 2026 shiv seo 1 min read Health

आजकल यदि आप अपने आसपास ध्यान से देखें, तो आपको आसानी से ऐसे लोग मिल जाएंगे जो घुटनों के दर्द, कमर की जकड़न या हाथ-पैरों के जोड़ों में दर्द से परेशान हैं। सबसे हैरानी की बात यह है कि अब यह समस्या केवल बुजुर्गों तक सीमित नहीं रही। पहले लोग मानते थे कि जोड़ों का दर्द बढ़ती उम्र के साथ होने वाली एक सामान्य परेशानी है, लेकिन अब कम उम्र के लड़के-लड़कियां भी सुबह उठते समय शरीर में अकड़न और चलते समय दर्द महसूस करने लगे हैं।


आज के समय में बहुत से लोग पूरा दिन कार्यालय में बैठकर काम करते हैं। सुबह कुर्सी पर बैठने के बाद वे कई घंटों तक बिना शरीर को हिलाए-डुलाए उसी स्थिति में काम करते रहते हैं। शुरुआत में इसका प्रभाव समझ नहीं आता, लेकिन धीरे-धीरे शरीर इसके संकेत देने लगता है। पहले हल्का दर्द महसूस होता है, फिर सीढ़ियां चढ़ते समय घुटनों में खिंचाव महसूस होने लगता है और कुछ समय बाद उठने-बैठने में भी कठिनाई होने लगती है। बहुत से लोग इसे सामान्य थकान समझकर अनदेखा कर देते हैं, लेकिन यही छोटी-छोटी समस्याएं आगे चलकर गंभीर जोड़ों के दर्द का कारण बन जाती हैं।


इसी कारण आज बड़ी संख्या में लोग यह जानना चाहते हैं कि आखिर जोड़ों के दर्द की वास्तविक वजह क्या है और क्या आयुर्वेद वास्तव में इसमें लाभ पहुंचा सकता है। दर्द निवारक दवाइयों से कुछ समय के लिए आराम तो मिल जाता है, लेकिन कुछ समय बाद दर्द फिर लौट आता है। ऐसे में लोग अब ऐसे उपचार की तलाश कर रहे हैं जो केवल दर्द को दबाने के बजाय उसकी जड़ तक पहुंचकर समस्या को समझे। यही कारण है कि पिछले कुछ वर्षों में आयुर्वेदिक उपचार और पंचकर्म जैसी चिकित्सा पद्धतियों पर लोगों का विश्वास तेजी से बढ़ा है। आइए, विश्वश्रद्धा हॉस्पिटल की डॉक्टर आकांक्षा श्रीवास्तव से इस विषय को विस्तार से समझते हैं।


Joint Pain आखिर होता क्यों है?


आज की बदलती जीवनशैली को यदि जोड़ों के दर्द का सबसे बड़ा कारण कहा जाए, तो यह गलत नहीं होगा। हमारी दिनचर्या पहले की तुलना में काफी कम सक्रिय हो गई है। अब अधिकतर काम मोबाइल, लैपटॉप और कुर्सी तक सीमित होकर रह गए हैं। शरीर की गतिविधियां जितनी कम होती जाती हैं, जोड़ों में जकड़न उतनी ही बढ़ने लगती है। यही कारण है कि आजकल कम उम्र के लोगों में भी घुटनों और कमर के दर्द की समस्या तेजी से बढ़ रही है।


डॉक्टर आकांक्षा श्रीवास्तव बताती हैं कि बहुत से लोग शिकायत करते हैं कि उनके जोड़ों में हर समय हल्का दर्द बना रहता है। इसका कारण केवल कमजोरी नहीं होता। कई बार शरीर में विटामिन डी और कैल्शियम की कमी के कारण हड्डियां कमजोर होने लगती हैं। कुछ लोगों में बढ़ता हुआ वजन जोड़ों पर आवश्यकता से अधिक दबाव डालता है, जबकि कई लोगों में लगातार तनाव और पर्याप्त नींद न लेना भी इस समस्या को बढ़ा देता है। धीरे-धीरे शरीर थकने लगता है और उसका प्रभाव जोड़ों पर साफ दिखाई देने लगता है।


आपने यह भी देखा होगा कि मौसम बदलते ही जोड़ों का दर्द अचानक बढ़ जाता है। विशेष रूप से ठंड का मौसम शुरू होते ही पुराने दर्द फिर से परेशान करने लगते हैं। सर्दियों में शरीर थोड़ा सिकुड़ने लगता है, मांसपेशियां कठोर हो जाती हैं और जोड़ों में जकड़न बढ़ने लगती है। यही कारण है कि कई लोगों को सुबह उठते समय शरीर पहले की तुलना में अधिक अकड़ा हुआ महसूस होता है।


सुबह की यह जकड़न कई बार लोगों को चिंता में भी डाल देती है। कुछ लोगों को बिस्तर से उठते समय ऐसा महसूस होता है मानो उनके घुटने ठीक प्रकार से मुड़ ही नहीं रहे हों। ऐसा इसलिए होता है क्योंकि रातभर शरीर एक ही स्थिति में रहता है और जोड़ों की गतिविधियां कम हो जाती हैं। जब सुबह अचानक शरीर चलना शुरू करता है, तब जकड़न अधिक महसूस होने लगती है।


गलत खानपान भी जोड़ों के दर्द को तेजी से बढ़ाने का काम करता है। आजकल लोगों में बाहर का भोजन खाने की आदत तेजी से बढ़ रही है। अधिक तला-भुना भोजन, ठंडे पेय पदार्थ, पैकेट वाले खाद्य पदार्थ और अत्यधिक मीठी चीजें शरीर में सूजन बढ़ाने लगती हैं। शुरुआत में इसका प्रभाव दिखाई नहीं देता, लेकिन धीरे-धीरे यही सूजन जोड़ों तक पहुंचकर दर्द का कारण बन जाती है।


बढ़ता हुआ वजन भी इस समस्या को और गंभीर बना देता है। हमारे शरीर का सबसे अधिक भार घुटनों पर पड़ता है। जब वजन आवश्यकता से अधिक बढ़ने लगता है, तब जोड़ों पर दबाव भी बढ़ जाता है। यही कारण है कि मोटापे से परेशान लोगों में घुटनों का दर्द अधिक देखने को मिलता है।


महिलाओं में जोड़ों के दर्द की समस्या अपेक्षाकृत अधिक दिखाई देती है। विशेष रूप से बढ़ती उम्र और रजोनिवृत्ति के बाद शरीर में कई प्रकार के हार्मोन संबंधी परिवर्तन होने लगते हैं। धीरे-धीरे शरीर में कैल्शियम की मात्रा कम होने लगती है और हड्डियां कमजोर पड़ने लगती हैं। यही कारण है कि कई महिलाओं को घुटनों और हाथों के जोड़ों में लगातार दर्द की शिकायत बनी रहती है।


Ayurveda Joint Pain को कैसे देखता है?


आयुर्वेद जोड़ों के दर्द को केवल एक सामान्य दर्द की समस्या मानकर नहीं देखता। आयुर्वेद के अनुसार जब शरीर भीतर से असंतुलित होने लगता है, तब उसका प्रभाव धीरे-धीरे जोड़ों पर दिखाई देने लगता है। आयुर्वेद में इस समस्या का सबसे बड़ा कारण वात दोष का बढ़ना माना गया है।


आयुर्वेद के अनुसार हमारे शरीर के जोड़ों को सहज रूप से चलाने के लिए उनमें प्राकृतिक चिकनाई मौजूद रहती है। लेकिन जब वात दोष बढ़ने लगता है, तब यह चिकनाई धीरे-धीरे कम होने लगती है। इसी कारण जोड़ों में सूखापन आने लगता है और शरीर को चलाने-फिराने में दर्द महसूस होने लगता है।


कई लोगों को जोड़ों को हिलाते समय कट-कट की आवाज भी सुनाई देती है। आयुर्वेद इसे भी वात दोष के असंतुलन का संकेत मानता है। शुरुआत में यह केवल हल्की परेशानी लगती है, लेकिन यदि समय रहते ध्यान न दिया जाए, तो यही समस्या आगे चलकर गंभीर रूप ले सकती है।


आयुर्वेद शरीर में जमा होने वाले “आम” को भी जोड़ों के दर्द का एक बड़ा कारण मानता है। सरल भाषा में समझें तो जब भोजन ठीक प्रकार से नहीं पचता, तब शरीर में हानिकारक तत्व बनने लगते हैं। यही तत्व धीरे-धीरे रक्त के माध्यम से जोड़ों तक पहुंच जाते हैं और वहां सूजन पैदा करने लगते हैं। इसी कारण कई लोगों को जोड़ों में दर्द के साथ भारीपन और जकड़न भी महसूस होती है।


आयुर्वेद की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि वह केवल दर्द को कम करने पर ध्यान नहीं देता, बल्कि यह समझने का प्रयास करता है कि दर्द बार-बार क्यों हो रहा है। यही कारण है कि आयुर्वेदिक उपचार में केवल औषधियां ही नहीं दी जातीं, बल्कि खानपान, दिनचर्या और शरीर के संतुलन पर भी विशेष ध्यान दिया जाता है। 


क्या सच में आयुर्वेदिक उपचार जोड़ों के दर्द में असरदार होता है?


आज बहुत बड़ी संख्या में लोग जोड़ों के दर्द के लिए आयुर्वेद की ओर बढ़ रहे हैं, क्योंकि वे केवल कुछ समय की राहत नहीं बल्कि लंबे समय तक आराम चाहते हैं। आयुर्वेदिक उपचार की सबसे बड़ी विशेषता यह मानी जाती है कि यह केवल दर्द को दबाने की कोशिश नहीं करता, बल्कि उसके पीछे छिपे कारण पर भी काम करता है।


आयुर्वेद धीरे-धीरे शरीर के भीतर प्राकृतिक रूप से सुधार की प्रक्रिया को बेहतर बनाने का प्रयास करता है। यही कारण है कि कुछ लोगों को इसका असर जल्दी दिखाई देता है, जबकि पुराने जोड़ों के दर्द में थोड़ा समय लग सकता है। हालांकि यदि व्यक्ति नियमित रूप से उपचार ले और साथ ही अपने खानपान तथा जीवनशैली में सुधार करे, तो अच्छे परिणाम देखने को मिल सकते हैं।


बहुत से लोग आयुर्वेद पर इसलिए भरोसा करते हैं, क्योंकि इसमें केवल दवाइयों पर ध्यान नहीं दिया जाता, बल्कि शरीर की पूरी स्थिति को समझकर उपचार किया जाता है। इसमें जड़ी-बूटियों, औषधीय तेलों, उपचार विधियों, खानपान और दिनचर्या सभी पर समान रूप से ध्यान दिया जाता है।


पुराने जोड़ों के दर्द में भी आयुर्वेद कई लोगों के लिए लाभकारी साबित हुआ है। खासतौर पर जब दर्द की वजह जकड़न, वात दोष का असंतुलन या सूजन हो, तब आयुर्वेदिक उपचार और जड़ी-बूटियां काफी मदद कर सकती हैं। यही कारण है कि कई लोगों को बिना शल्य चिकित्सा के भी आराम महसूस होता है।


आयुर्वेद का उद्देश्य केवल कुछ समय के लिए दर्द कम करना नहीं होता, बल्कि शरीर के संतुलन को बेहतर बनाना होता है, ताकि भविष्य में जोड़ों का दर्द दोबारा बढ़ने की संभावना कम हो सके।


पंचकर्म और आयुर्वेदिक उपचार जोड़ों के दर्द में कैसे मदद करते हैं?


आयुर्वेद में पंचकर्म को शरीर की गहराई से सफाई करने वाली प्रक्रिया माना जाता है। जोड़ों के दर्द में इसका मुख्य उद्देश्य शरीर में जमा हानिकारक तत्वों को बाहर निकालना और वात दोष को संतुलित करना होता है। यही वजह है कि कई लोगों को पंचकर्म के बाद शरीर पहले से हल्का और लचीला महसूस होने लगता है।


जोड़ों के दर्द में जानु बस्ती उपचार काफी लोकप्रिय माना जाता है। इस उपचार में घुटनों के ऊपर विशेष औषधीय तेल रखा जाता है, जिससे जोड़ों को भीतर तक गर्माहट और पोषण मिलने लगता है। कई लोगों को इससे जकड़न और घुटनों के दर्द में राहत महसूस होती है।


गर्म औषधीय तेलों से मालिश करना भी जोड़ों के दर्द में काफी लाभकारी माना जाता है। जब शरीर की मालिश औषधीय तेलों से की जाती है, तो मांसपेशियां आराम महसूस करने लगती हैं और रक्त संचार बेहतर होता है। इससे जोड़ों की जकड़न धीरे-धीरे कम होने लगती है।


स्वेदन उपचार के दौरान शरीर को विशेष तरीके से गर्माहट दी जाती है, जिससे जोड़ों की जकड़न कम होने लगती है। यह उपचार खासतौर पर उन लोगों के लिए लाभकारी माना जाता है, जिन्हें सुबह उठते समय अधिक जकड़न महसूस होती है।


हालांकि हर जोड़ों के दर्द से परेशान व्यक्ति के लिए पंचकर्म आवश्यक नहीं माना जाता। व्यक्ति की उम्र, शरीर की स्थिति और बीमारी की गंभीरता को देखकर ही उपचार तय किया जाता है। इसलिए किसी भी उपचार को विशेषज्ञ की सलाह के बिना करवाना उचित नहीं माना जाता।

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Written by

shiv seo

Ayurvedic Specialist · Shree Vishwshraddha Chikitshalaya, Prayagraj

Practising classical Ayurveda at Shree Vishwshraddha Chikitshalaya since 2008 — combining time-tested protocols like Ksharsutra and Panchakarma with modern clinical care for lasting, side-effect-free results.

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Medical disclaimer: This article is for general education only and is not a medical diagnosis. Every patient is different — please consult Dr. Ashutosh or Dr. Akanksha (or your own physician) before starting any treatment.
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