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Joint Pain और Vitamin D Deficiency में क्या संबंध है? जानिए रिसर्च क्या कहती है

Jun 30, 2026 shiv seo 2 min read Health
क्या बैठकर काम करने से Piles होता है? वैज्ञानिक शोध, मेडिकल तथ्य और विशेषज्ञों की राय Joint Pain और Vitamin D Deficiency में क्या संबंध है? जानिए रिसर्च क्या कहती है

Joint Pain और Vitamin D Deficiency में क्या संबंध है? जानिए रिसर्च क्या कहती है

कई साल पहले तक लोग मानते थे कि जोड़ों का दर्द तो उम्र बढ़ने के साथ ही होता है। लेकिन अब हालात पहले जैसे नहीं रहे। आजकल 25–30 साल के लोग भी घुटनों, कमर, कंधों, कलाई या टखनों में दर्द की शिकायत करते हुए दिखाई देते हैं। शुरुआत में ज़्यादातर लोग इसे गंभीरता से नहीं लेते। कोई कहता है कि आज काम ज़्यादा हो गया था, कोई इसे थकान समझकर नज़रअंदाज़ कर देता है, तो कोई सोचता है कि दो-चार दिन में अपने आप ठीक हो जाएगा।

लेकिन जब यही दर्द बार-बार होने लगे या लंबे समय तक बना रहे, तब सिर्फ थकान को इसकी वजह मान लेना सही नहीं होता। कई बार शरीर हमें पहले ही बता देता है कि अंदर कुछ कमी चल रही है। ऐसी ही एक कमी है विटामिन D की कमी, जिसके बारे में बहुत से लोगों को तब पता चलता है, जब डॉक्टर जांच लिख देते हैं

हैरानी की बात यह है कि यह परेशानी सिर्फ ठंडे देशों में ही नहीं, बल्कि भारत जैसे धूप वाले देश में भी काफी लोगों में देखने को मिल रही है। सोचने वाली बात यह है कि जब धूप की कमी नहीं है, तो फिर विटामिन D की कमी क्यों हो रही है? इसका जवाब हमारी रोज़मर्रा की आदतों में छिपा है। सुबह से शाम तक घर, ऑफिस या दूसरी बंद जगहों में रहना, धूप में कम निकलना और खाने-पीने पर ज़्यादा ध्यान न देना, ये सभी बातें धीरे-धीरे शरीर में विटामिन D की कमी पैदा कर सकती हैं।

यही वजह है कि अगर आपके जोड़ों, हड्डियों या मांसपेशियों में दर्द लंबे समय से बना हुआ है, तो सिर्फ दर्द कम करने की कोशिश करना काफी नहीं है। यह जानना भी ज़रूरी है कि कहीं इसकी वजह विटामिन D की कमी तो नहीं। आगे इस लेख में हम इसी विषय को आसान और सीधी भाषा में समझेंगे, ताकि आपको पता चल सके कि विटामिन D शरीर में क्या काम करता है, इसकी कमी होने पर कौन-कौन से संकेत दिखाई देते हैं और इस समस्या से कैसे बचा जा सकता है।

Vitamin D क्या है और यह शरीर के लिए इतना ज़रूरी क्यों माना जाता है?

विटामिन D हमारे शरीर के लिए उन ज़रूरी पोषक तत्वों में से एक है, जिसके बिना कई काम ठीक तरह से नहीं हो पाते। इसे सनशाइन विटामिन भी कहा जाता है, क्योंकि जब हमारी त्वचा कुछ समय तक धूप के संपर्क में रहती है, तब शरीर खुद ही इसे बनाना शुरू कर देता है।

ज़्यादातर लोग सोचते हैं कि विटामिन D का काम सिर्फ हड्डियों को मज़बूत रखना है, लेकिन इसकी ज़िम्मेदारी इससे कहीं ज़्यादा है। यह मांसपेशियों को सही ढंग से काम करने में मदद करता है, शरीर की रोगों से लड़ने की क्षमता को सहारा देता है और नसों के सामान्य कामकाज में भी अपनी भूमिका निभाता है। इसके साथ ही शरीर में कैल्शियम और फॉस्फोरस का सही तरीके से इस्तेमाल भी काफी हद तक विटामिन D पर निर्भर करता है। जब इसकी मात्रा पर्याप्त होती है, तो हड्डियां मज़बूत रहती हैं और मांसपेशियां भी बेहतर तरीके से काम कर पाती हैं।

Vitamin D की कमी से Joint Pain क्यों होता है?

जब शरीर में लंबे समय तक विटामिन D की कमी बनी रहती है, तो शरीर कैल्शियम का पूरा फायदा नहीं उठा पाता। इसका असर सबसे पहले हड्डियों और मांसपेशियों पर पड़ने लगता है। धीरे-धीरे हड्डियां कमजोर होने लगती हैं और मांसपेशियां भी पहले जैसी ताकत से काम नहीं कर पातीं।

ऐसे में कई लोगों को बिना किसी चोट या गिरने के भी घुटनों, कमर, कंधों, टखनों या दूसरे जोड़ों में दर्द महसूस होने लगता है। कुछ लोगों का दर्द सुबह उठते ही ज़्यादा रहता है, जबकि कई लोगों को दिनभर हल्का या लगातार दर्द बना रहता है

यहीं बात खत्म नहीं होती। कई शोध बताते हैं कि विटामिन D की कमी सिर्फ हड्डियों तक सीमित नहीं रहती। इसका असर मांसपेशियों पर भी पड़ सकता है, जिससे कमजोरी महसूस होती है, दर्द जल्दी होने लगता है और शरीर पहले की तुलना में ज़्यादा संवेदनशील हो जाता है। यही वजह है कि कई लोगों को लगता है जैसे पूरे शरीर में दर्द हो रहा है, जबकि असली कारण शरीर में विटामिन D की कमी होती है।

रिसर्च क्या कहती है?

पिछले कुछ वर्षों में दुनिया के अलग-अलग देशों में यह जानने के लिए कई शोध किए गए कि विटामिन D की कमी का जोड़ों के दर्द से कोई संबंध है या नहीं। इन शोधों में पाया गया कि जिन लोगों के शरीर में विटामिन D का स्तर कम था, उनमें हड्डियों और मांसपेशियों में दर्द की शिकायत ज़्यादा देखने को मिली। यह समस्या खासकर बुजुर्गों, महिलाओं और उन लोगों में अधिक पाई गई, जो ज़्यादातर समय घर या ऑफिस के अंदर ही रहते हैं।

कुछ अध्ययनों में यह भी देखा गया कि जिन लोगों में जांच के बाद विटामिन D की कमी की पुष्टि हुई और उन्होंने डॉक्टर की सलाह के अनुसार इसकी पूर्ति की, उन्होंने कुछ महीनों में दर्द और मांसपेशियों की कमजोरी में राहत महसूस हुई। हालांकि इसका यह मतलब नहीं है कि हर तरह का जोड़ों का दर्द सिर्फ विटामिन D की कमी से ही होता है। अगर दर्द की वजह गठिया, पुरानी चोट या कोई दूसरी बीमारी है, तो सिर्फ विटामिन D लेने से पूरी समस्या ठीक नहीं होती।

1. रूमेटाइड आर्थराइटिस (RA) और विटामिन D पर भारतीय शोध

रूमेटाइड आर्थराइटिस (Rheumatoid Arthritis) एक ऐसी ऑटोइम्यून बीमारी है, जिसमें शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली (Immune System) गलती से अपने ही जोड़ों पर हमला करने लगती है। इसके कारण जोड़ों में लगातार सूजन, दर्द, अकड़न और समय के साथ उनकी कार्यक्षमता में कमी आने लगती है। लंबे समय तक यह समस्या बनी रहने पर मरीज के दैनिक जीवन पर भी गहरा प्रभाव पड़ता है।

इसी महत्वपूर्ण विषय को बेहतर ढंग से समझने के लिए NIMS, हैदराबाद के रुमेटोलॉजी विभाग के वैज्ञानिकों ने यह जानने का प्रयास किया कि क्या विटामिन D की कमी और रूमेटाइड आर्थराइटिस की गंभीरता के बीच कोई प्रत्यक्ष संबंध मौजूद है। इस उद्देश्य से उन्होंने रूमेटाइड आर्थराइटिस से पीड़ित अनेक मरीजों के रक्त के नमूनों की जांच की तथा उनके शरीर में विटामिन D के स्तर की तुलना बीमारी की सक्रियता (Disease Activity) से की।

जांच के दौरान शोधकर्ताओं ने पाया कि अध्ययन में शामिल 80 प्रतिशत से अधिक मरीजों में विटामिन D का स्तर सामान्य सीमा से काफी कम था। यह केवल एक सामान्य कमी नहीं थी, बल्कि अधिकांश मरीज स्पष्ट रूप से विटामिन D की कमी (Vitamin D Deficiency) से प्रभावित थे।

इसके बाद वैज्ञानिकों ने मरीजों के Disease Activity Score-28 (DAS28) का विश्लेषण किया, जो यह बताता है कि रूमेटाइड आर्थराइटिस कितनी गंभीर अवस्था में है। परिणामों ने एक महत्वपूर्ण तथ्य सामने रखा। जिन मरीजों के शरीर में विटामिन D का स्तर जितना कम था, उनके DAS28 स्कोर उतने ही अधिक थे। दूसरे शब्दों में, विटामिन D की कमी बढ़ने के साथ-साथ जोड़ों में सूजन, दर्द और बीमारी की सक्रियता भी बढ़ती दिखाई दी।

इस अध्ययन ने यह संकेत दिया कि विटामिन D केवल हड्डियों को मजबूत रखने वाला पोषक तत्व नहीं है, बल्कि यह शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली को संतुलित रखने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। जब इसकी कमी होती है, तो प्रतिरक्षा प्रणाली का असंतुलन बढ़ सकता है, जिससे रूमेटाइड आर्थराइटिस के लक्षण और अधिक गंभीर हो सकते हैं।

इस शोध का सबसे महत्वपूर्ण संदेश यह था कि भारत जैसे धूप वाले देश में रहने वाले लोगों में भी विटामिन D की कमी व्यापक रूप से पाई जा सकती है। इसलिए यदि किसी व्यक्ति को लंबे समय से जोड़ों में दर्द, सूजन या रूमेटाइड आर्थराइटिस की समस्या है, तो उपचार के साथ-साथ विटामिन D की जांच भी चिकित्सकीय दृष्टि से उपयोगी साबित हो सकती है। यही कारण है कि इस अध्ययन को भारतीय रुमेटोलॉजी के क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण शोध माना जाता है।

2. ऑस्टियोआर्थराइटिस (घुटनों का दर्द) और विटामिन D पर फ्रेमिंगघम स्टडी

ऑस्टियोआर्थराइटिस (Osteoarthritis) दुनिया भर में घुटनों का दर्द का सबसे सामान्य कारण माना जाता है। यह बीमारी धीरे-धीरे विकसित होती है और समय के साथ जोड़ों के बीच मौजूद कार्टिलेज (Cartilage) घिसने लगता है। जैसे-जैसे यह सुरक्षात्मक परत पतली होती जाती है, वैसे-वैसे हड्डियां आपस में अधिक रगड़ खाने लगती हैं, जिसके कारण दर्द, अकड़न और चलने-फिरने में कठिनाई बढ़ने लगती है।

इसी बीमारी के पीछे छिपे संभावित कारणों को समझने के लिए Boston University School of Medicine के वैज्ञानिकों ने विश्व प्रसिद्ध Framingham Knee Osteoarthritis Study के अंतर्गत एक विस्तृत दीर्घकालिक अध्ययन किया। इस अध्ययन में कई वर्षों तक बड़ी संख्या में बुजुर्ग प्रतिभागियों का नियमित रूप से स्वास्थ्य परीक्षण किया गया।

शोधकर्ताओं ने समय-समय पर प्रतिभागियों के घुटनों के एक्स-रे किए, उनके रक्त में विटामिन D के स्तर की जांच की तथा यह देखा कि समय के साथ उनके घुटनों की स्थिति में किस प्रकार परिवर्तन हो रहा है।

कई वर्षों तक प्राप्त आंकड़ों का विश्लेषण करने के बाद वैज्ञानिकों ने पाया कि जिन लोगों में विटामिन D की कमी थी, उनमें घुटनों के ऑस्टियोआर्थराइटिस के तेजी से बढ़ने की संभावना सामान्य लोगों की तुलना में लगभग तीन गुना अधिक थी।

यह निष्कर्ष इसलिए भी महत्वपूर्ण था क्योंकि इससे पहले विटामिन D को मुख्य रूप से केवल हड्डियों की मजबूती से जोड़कर देखा जाता था। लेकिन इस अध्ययन ने पहली बार यह स्पष्ट संकेत दिया कि विटामिन D जोड़ों के बीच मौजूद कार्टिलेज की संरचना और उसके संरक्षण में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।

शोधकर्ताओं ने यह भी माना कि पर्याप्त मात्रा में विटामिन D शरीर में कैल्शियम के संतुलन, हड्डियों के स्वास्थ्य तथा जोड़ों के आसपास मौजूद ऊतकों के सामान्य कार्य को बनाए रखने में सहायता करता है। जब इसकी कमी होती है, तो समय के साथ जोड़ों में होने वाले क्षरण (Degeneration) की प्रक्रिया अधिक तेज हो सकती है।

इसी कारण यह अध्ययन ऑस्टियोआर्थराइटिस और विटामिन D के संबंध को समझने वाले सबसे प्रभावशाली शुरुआती शोधों में गिना जाता है और आज भी इस विषय पर होने वाले अनेक अध्ययनों में इसका उल्लेख किया जाता है।

3. क्रोनिक मस्कुलोस्केलेटल पेन और विटामिन D सप्लीमेंटेशन पर क्लीनिकल ट्रायल

कई ऐसे मरीज होते हैं जिन्हें महीनों या वर्षों तक जोड़ों, मांसपेशियों और पीठ में लगातार दर्द बना रहता है, लेकिन विस्तृत जांच के बाद भी दर्द का कोई स्पष्ट कारण सामने नहीं आता। चिकित्सा विज्ञान में इस स्थिति को Non-specific Chronic Musculoskeletal Pain कहा जाता है।

इसी समस्या के समाधान की दिशा में University of Alberta के वैज्ञानिकों ने यह जांचने का निर्णय लिया कि क्या विटामिन D की कमी इस लंबे समय तक बने रहने वाले दर्द से जुड़ी हो सकती है।

इसके लिए उन्होंने एक Randomized Controlled Trial (RCT) आयोजित किया, जिसे चिकित्सा अनुसंधान में सबसे विश्वसनीय अध्ययन पद्धतियों में से एक माना जाता है। अध्ययन में शामिल मरीजों को यादृच्छिक रूप से दो समूहों में विभाजित किया गया। पहले समूह को निर्धारित मात्रा में विटामिन D सप्लीमेंट दिया गया, जबकि दूसरे समूह को प्लेसिबो (ऐसी गोली जिसमें सक्रिय दवा नहीं होती) दिया गया।

कुछ समय तक दोनों समूहों की नियमित निगरानी की गई और समय-समय पर उनके दर्द की तीव्रता, शारीरिक गतिविधियों तथा जीवन की गुणवत्ता का मूल्यांकन किया गया।

अध्ययन पूरा होने के बाद प्राप्त परिणाम काफी महत्वपूर्ण थे। जिन मरीजों को विटामिन D सप्लीमेंट दिया गया था, उनमें दर्द की तीव्रता में 50 प्रतिशत से अधिक की कमी देखी गई। इसके साथ ही कई मरीजों ने दैनिक गतिविधियां करने में पहले की तुलना में अधिक सुविधा और आराम महसूस किया।

शोधकर्ताओं ने इस परिणाम की व्याख्या करते हुए बताया कि विटामिन D केवल हड्डियों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह मांसपेशियों, नसों और दर्द को नियंत्रित करने वाले जैविक तंत्र (Pain Processing Mechanism) पर भी प्रभाव डालता है। जब शरीर में इसकी कमी होती है, तो दर्द महसूस कराने वाले तंत्र अधिक संवेदनशील हो सकते हैं, जिससे सामान्य दर्द भी अधिक तीव्र महसूस होने लगता है।

हालांकि वैज्ञानिकों ने यह भी स्पष्ट किया कि हर प्रकार के पुराने दर्द का कारण केवल विटामिन D की कमी नहीं होता, लेकिन जिन मरीजों में इसकी कमी मौजूद हो, उनमें उचित चिकित्सकीय सलाह के अनुसार विटामिन D की पूर्ति करने से दर्द में उल्लेखनीय सुधार संभव हो सकता है। यही कारण है कि इस अध्ययन को क्रोनिक मस्कुलोस्केलेटल पेन और विटामिन D के संबंध को समझने वाले महत्वपूर्ण क्लीनिकल ट्रायल्स में शामिल किया जाता है।

निष्कर्ष

एक यादगार किटी पार्टी का संबंध बड़े बजट से नहीं, बल्कि अच्छी योजना और सही निर्णयों से होता है। यदि आप बजट, वेन्यू, मेन्यू और गतिविधियों का संतुलित चुनाव करती हैं, तो कम खर्च में भी ऐसा आयोजन कर सकती हैं जिसे मेहमान लंबे समय तक याद रखें। आखिर सबसे सफल किटी पार्टी वही होती है, जहां लोग सिर्फ अच्छा खाना नहीं, बल्कि साथ बिताए गए खूबसूरत पलों की यादें भी अपने साथ लेकर जाएं।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
Vitamin D Deficiency के सामान्य लक्षण क्या है

विटामिन D की कमी एक दिन में नहीं होती, बल्कि धीरे-धीरे बढ़ती है। इसलिए शुरुआत में ज़्यादातर लोगों को पता ही नहीं चलता कि शरीर में इसकी कमी हो रही है। समय बीतने के साथ पूरे शरीर में दर्द, जोड़ों में जकड़न, मांसपेशियों में कमजोरी और बिना ज़्यादा काम किए भी थकान महसूस होने लगती है।

कई लोगों को सीढ़ियां चढ़ने, कुर्सी से उठने या थोड़ा ज़्यादा चलने में भी परेशानी होने लगती है। इसके अलावा कमर दर्द, कूल्हों में दर्द और पैरों में भारीपन भी इस कमी के आम संकेत हो सकते हैं। अगर लंबे समय तक इस कमी पर ध्यान न दिया जाए, तो इसका असर हड्डियों पर भी पड़ने लगता है। ऐसे में हड्डियां कमजोर हो सकती हैं और छोटी-सी चोट लगने पर भी फ्रैक्चर का खतरा बढ़ जाता है।

किन लोगों में Vitamin D की कमी का खतरा सबसे अधिक होता है?

हर व्यक्ति में विटामिन D की कमी होने की संभावना एक जैसी नहीं होती। कुछ लोगों में यह खतरा दूसरों के मुकाबले ज़्यादा रहता है। सबसे पहले वे लोग आते हैं, जो दिन का ज़्यादातर समय घर, ऑफिस या फैक्ट्री के अंदर बिताते हैं और धूप में बहुत कम निकल पाते हैं। ऐसे लोगों के शरीर को पर्याप्त विटामिन D नहीं मिल पाता तट।

इसके अलावा बुजुर्ग, मोटापे से परेशान लोग, गर्भवती महिलाएं, स्तनपान कराने वाली माताएं, गहरे रंग की त्वचा वाले लोग और वे लोग जिनकी आंतें भोजन से पोषक तत्व ठीक से नहीं ले पातीं, उनमें भी इसकी कमी ज़्यादा देखी जाती है।

भारत में हुए कई शोध भी यही बताते हैं कि धूप की कमी न होने के बावजूद बड़ी संख्या में लोगों के शरीर में विटामिन D का स्तर सामान्य से कम है। इसका सबसे बड़ा कारण यह है कि आजकल ज़्यादातर लोग खुली धूप में पहले जितना समय नहीं बिता पाते।

क्या हर Joint Pain का कारण Vitamin D की कमी होती है?

इस प्रश्न का उत्तर है—नहीं।

Joint Pain के पीछे कई अलग-अलग कारण हो सकते हैं। उम्र बढ़ने के साथ होने वाला ऑस्टियोआर्थराइटिस, रूमेटाइड आर्थराइटिस, यूरिक एसिड बढ़ने से होने वाला गाउट, खेल के दौरान लगी चोट, संक्रमण, ऑटोइम्यून रोग तथा कुछ अन्य पोषण संबंधी कमियां भी जोड़ों के दर्द का कारण बन सकती हैं।

इसी कारण केवल लक्षण देखकर Vitamin D Deficiency का निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता। सही कारण जानने के लिए चिकित्सकीय जांच आवश्यक होती है।

Vitamin D की जांच कैसे होती है?

यदि किसी व्यक्ति को लंबे समय से जोड़ों, हड्डियों या मांसपेशियों में दर्द बना हुआ है, तो डॉक्टर रक्त जांच कराने की सलाह दे सकते हैं।

इस जांच को 25-Hydroxy Vitamin D [25(OH)D] Test कहा जाता है। यही जांच शरीर में Vitamin D के वास्तविक स्तर का सबसे विश्वसनीय संकेत देती है।

रिपोर्ट के आधार पर डॉक्टर यह तय करते हैं कि व्यक्ति में कमी है या नहीं और यदि है, तो उसकी गंभीरता कितनी है।

Vitamin D की कमी पूरी कैसे की जाती है?

यदि जांच में कमी की पुष्टि हो जाती है, तो डॉक्टर व्यक्ति की उम्र, वजन, स्वास्थ्य स्थिति और कमी के स्तर के अनुसार Vitamin D सप्लीमेंट की सलाह देते हैं।

इसके साथ-साथ नियंत्रित मात्रा में नियमित धूप लेना भी महत्वपूर्ण माना जाता है। सुबह या शाम की हल्की धूप कई लोगों के लिए लाभदायक हो सकती है, हालांकि धूप से Vitamin D बनने की क्षमता त्वचा के रंग, मौसम, स्थान, कपड़ों और धूप में बिताए गए समय पर भी निर्भर करती है।

खान-पान में अंडे की जर्दी, वसायुक्त मछली, फोर्टिफाइड दूध, फोर्टिफाइड डेयरी उत्पाद और कुछ फोर्टिफाइड अनाज Vitamin D के अच्छे स्रोत माने जाते हैं। पर्याप्त कैल्शियम का सेवन भी उतना ही जरूरी है, क्योंकि Vitamin D और कैल्शियम मिलकर हड्डियों को मजबूत बनाए रखते हैं।

क्या बिना जांच के Vitamin D सप्लीमेंट लेना सही है?

कई लोग इंटरनेट या दूसरों की सलाह पर Vitamin D की गोलियां लेना शुरू कर देते हैं। लेकिन यह सही तरीका नहीं है।

Vitamin D एक Fat-Soluble Vitamin है, जिसका अत्यधिक सेवन शरीर में जमा हो सकता है। जरूरत से ज्यादा मात्रा लेने पर रक्त में कैल्शियम का स्तर असामान्य रूप से बढ़ सकता है, जिससे मतली, उल्टी, कब्ज, अत्यधिक प्यास, बार-बार पेशाब आना और गंभीर मामलों में किडनी को नुकसान जैसी समस्याएं हो सकती हैं।

इसीलिए Vitamin D सप्लीमेंट हमेशा डॉक्टर की सलाह और आवश्यकता पड़ने पर जांच के आधार पर ही लेना चाहिए।

Joint Pain और Vitamin D Deficiency में क्या संबंध है? जानिए रिसर्च क्या कहती है

Joint Pain और Vitamin D Deficiency में क्या संबंध है? जानिए रिसर्च क्या कहती है

कई साल पहले तक लोग मानते थे कि जोड़ों का दर्द तो उम्र बढ़ने के साथ ही होता है। लेकिन अब हालात पहले जैसे नहीं रहे। आजकल 25–30 साल के लोग भी घुटनों, कमर, कंधों, कलाई या टखनों में दर्द की शिकायत करते हुए दिखाई देते हैं। शुरुआत में ज़्यादातर लोग इसे गंभीरता से नहीं लेते। कोई कहता है कि आज काम ज़्यादा हो गया था, कोई इसे थकान समझकर नज़रअंदाज़ कर देता है, तो कोई सोचता है कि दो-चार दिन में अपने आप ठीक हो जाएगा।

लेकिन जब यही दर्द बार-बार होने लगे या लंबे समय तक बना रहे, तब सिर्फ थकान को इसकी वजह मान लेना सही नहीं होता। कई बार शरीर हमें पहले ही बता देता है कि अंदर कुछ कमी चल रही है। ऐसी ही एक कमी है विटामिन D की कमी, जिसके बारे में बहुत से लोगों को तब पता चलता है, जब डॉक्टर जांच लिख देते हैं

हैरानी की बात यह है कि यह परेशानी सिर्फ ठंडे देशों में ही नहीं, बल्कि भारत जैसे धूप वाले देश में भी काफी लोगों में देखने को मिल रही है। सोचने वाली बात यह है कि जब धूप की कमी नहीं है, तो फिर विटामिन D की कमी क्यों हो रही है? इसका जवाब हमारी रोज़मर्रा की आदतों में छिपा है। सुबह से शाम तक घर, ऑफिस या दूसरी बंद जगहों में रहना, धूप में कम निकलना और खाने-पीने पर ज़्यादा ध्यान न देना, ये सभी बातें धीरे-धीरे शरीर में विटामिन D की कमी पैदा कर सकती हैं।

यही वजह है कि अगर आपके जोड़ों, हड्डियों या मांसपेशियों में दर्द लंबे समय से बना हुआ है, तो सिर्फ दर्द कम करने की कोशिश करना काफी नहीं है। यह जानना भी ज़रूरी है कि कहीं इसकी वजह विटामिन D की कमी तो नहीं। आगे इस लेख में हम इसी विषय को आसान और सीधी भाषा में समझेंगे, ताकि आपको पता चल सके कि विटामिन D शरीर में क्या काम करता है, इसकी कमी होने पर कौन-कौन से संकेत दिखाई देते हैं और इस समस्या से कैसे बचा जा सकता है।

Vitamin D क्या है और यह शरीर के लिए इतना ज़रूरी क्यों माना जाता है?

विटामिन D हमारे शरीर के लिए उन ज़रूरी पोषक तत्वों में से एक है, जिसके बिना कई काम ठीक तरह से नहीं हो पाते। इसे सनशाइन विटामिन भी कहा जाता है, क्योंकि जब हमारी त्वचा कुछ समय तक धूप के संपर्क में रहती है, तब शरीर खुद ही इसे बनाना शुरू कर देता है।

ज़्यादातर लोग सोचते हैं कि विटामिन D का काम सिर्फ हड्डियों को मज़बूत रखना है, लेकिन इसकी ज़िम्मेदारी इससे कहीं ज़्यादा है। यह मांसपेशियों को सही ढंग से काम करने में मदद करता है, शरीर की रोगों से लड़ने की क्षमता को सहारा देता है और नसों के सामान्य कामकाज में भी अपनी भूमिका निभाता है। इसके साथ ही शरीर में कैल्शियम और फॉस्फोरस का सही तरीके से इस्तेमाल भी काफी हद तक विटामिन D पर निर्भर करता है। जब इसकी मात्रा पर्याप्त होती है, तो हड्डियां मज़बूत रहती हैं और मांसपेशियां भी बेहतर तरीके से काम कर पाती हैं।

Vitamin D की कमी से Joint Pain क्यों होता है?

जब शरीर में लंबे समय तक विटामिन D की कमी बनी रहती है, तो शरीर कैल्शियम का पूरा फायदा नहीं उठा पाता। इसका असर सबसे पहले हड्डियों और मांसपेशियों पर पड़ने लगता है। धीरे-धीरे हड्डियां कमजोर होने लगती हैं और मांसपेशियां भी पहले जैसी ताकत से काम नहीं कर पातीं।

ऐसे में कई लोगों को बिना किसी चोट या गिरने के भी घुटनों, कमर, कंधों, टखनों या दूसरे जोड़ों में दर्द महसूस होने लगता है। कुछ लोगों का दर्द सुबह उठते ही ज़्यादा रहता है, जबकि कई लोगों को दिनभर हल्का या लगातार दर्द बना रहता है

यहीं बात खत्म नहीं होती। कई शोध बताते हैं कि विटामिन D की कमी सिर्फ हड्डियों तक सीमित नहीं रहती। इसका असर मांसपेशियों पर भी पड़ सकता है, जिससे कमजोरी महसूस होती है, दर्द जल्दी होने लगता है और शरीर पहले की तुलना में ज़्यादा संवेदनशील हो जाता है। यही वजह है कि कई लोगों को लगता है जैसे पूरे शरीर में दर्द हो रहा है, जबकि असली कारण शरीर में विटामिन D की कमी होती है।

रिसर्च क्या कहती है?

पिछले कुछ वर्षों में दुनिया के अलग-अलग देशों में यह जानने के लिए कई शोध किए गए कि विटामिन D की कमी का जोड़ों के दर्द से कोई संबंध है या नहीं। इन शोधों में पाया गया कि जिन लोगों के शरीर में विटामिन D का स्तर कम था, उनमें हड्डियों और मांसपेशियों में दर्द की शिकायत ज़्यादा देखने को मिली। यह समस्या खासकर बुजुर्गों, महिलाओं और उन लोगों में अधिक पाई गई, जो ज़्यादातर समय घर या ऑफिस के अंदर ही रहते हैं।

कुछ अध्ययनों में यह भी देखा गया कि जिन लोगों में जांच के बाद विटामिन D की कमी की पुष्टि हुई और उन्होंने डॉक्टर की सलाह के अनुसार इसकी पूर्ति की, उन्होंने कुछ महीनों में दर्द और मांसपेशियों की कमजोरी में राहत महसूस हुई। हालांकि इसका यह मतलब नहीं है कि हर तरह का जोड़ों का दर्द सिर्फ विटामिन D की कमी से ही होता है। अगर दर्द की वजह गठिया, पुरानी चोट या कोई दूसरी बीमारी है, तो सिर्फ विटामिन D लेने से पूरी समस्या ठीक नहीं होती।

1. रूमेटाइड आर्थराइटिस (RA) और विटामिन D पर भारतीय शोध

रूमेटाइड आर्थराइटिस (Rheumatoid Arthritis) एक ऐसी ऑटोइम्यून बीमारी है, जिसमें शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली (Immune System) गलती से अपने ही जोड़ों पर हमला करने लगती है। इसके कारण जोड़ों में लगातार सूजन, दर्द, अकड़न और समय के साथ उनकी कार्यक्षमता में कमी आने लगती है। लंबे समय तक यह समस्या बनी रहने पर मरीज के दैनिक जीवन पर भी गहरा प्रभाव पड़ता है।

इसी महत्वपूर्ण विषय को बेहतर ढंग से समझने के लिए NIMS, हैदराबाद के रुमेटोलॉजी विभाग के वैज्ञानिकों ने यह जानने का प्रयास किया कि क्या विटामिन D की कमी और रूमेटाइड आर्थराइटिस की गंभीरता के बीच कोई प्रत्यक्ष संबंध मौजूद है। इस उद्देश्य से उन्होंने रूमेटाइड आर्थराइटिस से पीड़ित अनेक मरीजों के रक्त के नमूनों की जांच की तथा उनके शरीर में विटामिन D के स्तर की तुलना बीमारी की सक्रियता (Disease Activity) से की।

जांच के दौरान शोधकर्ताओं ने पाया कि अध्ययन में शामिल 80 प्रतिशत से अधिक मरीजों में विटामिन D का स्तर सामान्य सीमा से काफी कम था। यह केवल एक सामान्य कमी नहीं थी, बल्कि अधिकांश मरीज स्पष्ट रूप से विटामिन D की कमी (Vitamin D Deficiency) से प्रभावित थे।

इसके बाद वैज्ञानिकों ने मरीजों के Disease Activity Score-28 (DAS28) का विश्लेषण किया, जो यह बताता है कि रूमेटाइड आर्थराइटिस कितनी गंभीर अवस्था में है। परिणामों ने एक महत्वपूर्ण तथ्य सामने रखा। जिन मरीजों के शरीर में विटामिन D का स्तर जितना कम था, उनके DAS28 स्कोर उतने ही अधिक थे। दूसरे शब्दों में, विटामिन D की कमी बढ़ने के साथ-साथ जोड़ों में सूजन, दर्द और बीमारी की सक्रियता भी बढ़ती दिखाई दी।

इस अध्ययन ने यह संकेत दिया कि विटामिन D केवल हड्डियों को मजबूत रखने वाला पोषक तत्व नहीं है, बल्कि यह शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली को संतुलित रखने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। जब इसकी कमी होती है, तो प्रतिरक्षा प्रणाली का असंतुलन बढ़ सकता है, जिससे रूमेटाइड आर्थराइटिस के लक्षण और अधिक गंभीर हो सकते हैं।

इस शोध का सबसे महत्वपूर्ण संदेश यह था कि भारत जैसे धूप वाले देश में रहने वाले लोगों में भी विटामिन D की कमी व्यापक रूप से पाई जा सकती है। इसलिए यदि किसी व्यक्ति को लंबे समय से जोड़ों में दर्द, सूजन या रूमेटाइड आर्थराइटिस की समस्या है, तो उपचार के साथ-साथ विटामिन D की जांच भी चिकित्सकीय दृष्टि से उपयोगी साबित हो सकती है। यही कारण है कि इस अध्ययन को भारतीय रुमेटोलॉजी के क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण शोध माना जाता है।

2. ऑस्टियोआर्थराइटिस (घुटनों का दर्द) और विटामिन D पर फ्रेमिंगघम स्टडी

ऑस्टियोआर्थराइटिस (Osteoarthritis) दुनिया भर में घुटनों का दर्द का सबसे सामान्य कारण माना जाता है। यह बीमारी धीरे-धीरे विकसित होती है और समय के साथ जोड़ों के बीच मौजूद कार्टिलेज (Cartilage) घिसने लगता है। जैसे-जैसे यह सुरक्षात्मक परत पतली होती जाती है, वैसे-वैसे हड्डियां आपस में अधिक रगड़ खाने लगती हैं, जिसके कारण दर्द, अकड़न और चलने-फिरने में कठिनाई बढ़ने लगती है।

इसी बीमारी के पीछे छिपे संभावित कारणों को समझने के लिए Boston University School of Medicine के वैज्ञानिकों ने विश्व प्रसिद्ध Framingham Knee Osteoarthritis Study के अंतर्गत एक विस्तृत दीर्घकालिक अध्ययन किया। इस अध्ययन में कई वर्षों तक बड़ी संख्या में बुजुर्ग प्रतिभागियों का नियमित रूप से स्वास्थ्य परीक्षण किया गया।

शोधकर्ताओं ने समय-समय पर प्रतिभागियों के घुटनों के एक्स-रे किए, उनके रक्त में विटामिन D के स्तर की जांच की तथा यह देखा कि समय के साथ उनके घुटनों की स्थिति में किस प्रकार परिवर्तन हो रहा है।

कई वर्षों तक प्राप्त आंकड़ों का विश्लेषण करने के बाद वैज्ञानिकों ने पाया कि जिन लोगों में विटामिन D की कमी थी, उनमें घुटनों के ऑस्टियोआर्थराइटिस के तेजी से बढ़ने की संभावना सामान्य लोगों की तुलना में लगभग तीन गुना अधिक थी।

यह निष्कर्ष इसलिए भी महत्वपूर्ण था क्योंकि इससे पहले विटामिन D को मुख्य रूप से केवल हड्डियों की मजबूती से जोड़कर देखा जाता था। लेकिन इस अध्ययन ने पहली बार यह स्पष्ट संकेत दिया कि विटामिन D जोड़ों के बीच मौजूद कार्टिलेज की संरचना और उसके संरक्षण में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।

शोधकर्ताओं ने यह भी माना कि पर्याप्त मात्रा में विटामिन D शरीर में कैल्शियम के संतुलन, हड्डियों के स्वास्थ्य तथा जोड़ों के आसपास मौजूद ऊतकों के सामान्य कार्य को बनाए रखने में सहायता करता है। जब इसकी कमी होती है, तो समय के साथ जोड़ों में होने वाले क्षरण (Degeneration) की प्रक्रिया अधिक तेज हो सकती है।

इसी कारण यह अध्ययन ऑस्टियोआर्थराइटिस और विटामिन D के संबंध को समझने वाले सबसे प्रभावशाली शुरुआती शोधों में गिना जाता है और आज भी इस विषय पर होने वाले अनेक अध्ययनों में इसका उल्लेख किया जाता है।

3. क्रोनिक मस्कुलोस्केलेटल पेन और विटामिन D सप्लीमेंटेशन पर क्लीनिकल ट्रायल

कई ऐसे मरीज होते हैं जिन्हें महीनों या वर्षों तक जोड़ों, मांसपेशियों और पीठ में लगातार दर्द बना रहता है, लेकिन विस्तृत जांच के बाद भी दर्द का कोई स्पष्ट कारण सामने नहीं आता। चिकित्सा विज्ञान में इस स्थिति को Non-specific Chronic Musculoskeletal Pain कहा जाता है।

इसी समस्या के समाधान की दिशा में University of Alberta के वैज्ञानिकों ने यह जांचने का निर्णय लिया कि क्या विटामिन D की कमी इस लंबे समय तक बने रहने वाले दर्द से जुड़ी हो सकती है।

इसके लिए उन्होंने एक Randomized Controlled Trial (RCT) आयोजित किया, जिसे चिकित्सा अनुसंधान में सबसे विश्वसनीय अध्ययन पद्धतियों में से एक माना जाता है। अध्ययन में शामिल मरीजों को यादृच्छिक रूप से दो समूहों में विभाजित किया गया। पहले समूह को निर्धारित मात्रा में विटामिन D सप्लीमेंट दिया गया, जबकि दूसरे समूह को प्लेसिबो (ऐसी गोली जिसमें सक्रिय दवा नहीं होती) दिया गया।

कुछ समय तक दोनों समूहों की नियमित निगरानी की गई और समय-समय पर उनके दर्द की तीव्रता, शारीरिक गतिविधियों तथा जीवन की गुणवत्ता का मूल्यांकन किया गया।

अध्ययन पूरा होने के बाद प्राप्त परिणाम काफी महत्वपूर्ण थे। जिन मरीजों को विटामिन D सप्लीमेंट दिया गया था, उनमें दर्द की तीव्रता में 50 प्रतिशत से अधिक की कमी देखी गई। इसके साथ ही कई मरीजों ने दैनिक गतिविधियां करने में पहले की तुलना में अधिक सुविधा और आराम महसूस किया।

शोधकर्ताओं ने इस परिणाम की व्याख्या करते हुए बताया कि विटामिन D केवल हड्डियों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह मांसपेशियों, नसों और दर्द को नियंत्रित करने वाले जैविक तंत्र (Pain Processing Mechanism) पर भी प्रभाव डालता है। जब शरीर में इसकी कमी होती है, तो दर्द महसूस कराने वाले तंत्र अधिक संवेदनशील हो सकते हैं, जिससे सामान्य दर्द भी अधिक तीव्र महसूस होने लगता है।

हालांकि वैज्ञानिकों ने यह भी स्पष्ट किया कि हर प्रकार के पुराने दर्द का कारण केवल विटामिन D की कमी नहीं होता, लेकिन जिन मरीजों में इसकी कमी मौजूद हो, उनमें उचित चिकित्सकीय सलाह के अनुसार विटामिन D की पूर्ति करने से दर्द में उल्लेखनीय सुधार संभव हो सकता है। यही कारण है कि इस अध्ययन को क्रोनिक मस्कुलोस्केलेटल पेन और विटामिन D के संबंध को समझने वाले महत्वपूर्ण क्लीनिकल ट्रायल्स में शामिल किया जाता है।

निष्कर्ष

एक यादगार किटी पार्टी का संबंध बड़े बजट से नहीं, बल्कि अच्छी योजना और सही निर्णयों से होता है। यदि आप बजट, वेन्यू, मेन्यू और गतिविधियों का संतुलित चुनाव करती हैं, तो कम खर्च में भी ऐसा आयोजन कर सकती हैं जिसे मेहमान लंबे समय तक याद रखें। आखिर सबसे सफल किटी पार्टी वही होती है, जहां लोग सिर्फ अच्छा खाना नहीं, बल्कि साथ बिताए गए खूबसूरत पलों की यादें भी अपने साथ लेकर जाएं।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
Vitamin D Deficiency के सामान्य लक्षण क्या है

विटामिन D की कमी एक दिन में नहीं होती, बल्कि धीरे-धीरे बढ़ती है। इसलिए शुरुआत में ज़्यादातर लोगों को पता ही नहीं चलता कि शरीर में इसकी कमी हो रही है। समय बीतने के साथ पूरे शरीर में दर्द, जोड़ों में जकड़न, मांसपेशियों में कमजोरी और बिना ज़्यादा काम किए भी थकान महसूस होने लगती है।

कई लोगों को सीढ़ियां चढ़ने, कुर्सी से उठने या थोड़ा ज़्यादा चलने में भी परेशानी होने लगती है। इसके अलावा कमर दर्द, कूल्हों में दर्द और पैरों में भारीपन भी इस कमी के आम संकेत हो सकते हैं। अगर लंबे समय तक इस कमी पर ध्यान न दिया जाए, तो इसका असर हड्डियों पर भी पड़ने लगता है। ऐसे में हड्डियां कमजोर हो सकती हैं और छोटी-सी चोट लगने पर भी फ्रैक्चर का खतरा बढ़ जाता है।

किन लोगों में Vitamin D की कमी का खतरा सबसे अधिक होता है?

हर व्यक्ति में विटामिन D की कमी होने की संभावना एक जैसी नहीं होती। कुछ लोगों में यह खतरा दूसरों के मुकाबले ज़्यादा रहता है। सबसे पहले वे लोग आते हैं, जो दिन का ज़्यादातर समय घर, ऑफिस या फैक्ट्री के अंदर बिताते हैं और धूप में बहुत कम निकल पाते हैं। ऐसे लोगों के शरीर को पर्याप्त विटामिन D नहीं मिल पाता तट।

इसके अलावा बुजुर्ग, मोटापे से परेशान लोग, गर्भवती महिलाएं, स्तनपान कराने वाली माताएं, गहरे रंग की त्वचा वाले लोग और वे लोग जिनकी आंतें भोजन से पोषक तत्व ठीक से नहीं ले पातीं, उनमें भी इसकी कमी ज़्यादा देखी जाती है।

भारत में हुए कई शोध भी यही बताते हैं कि धूप की कमी न होने के बावजूद बड़ी संख्या में लोगों के शरीर में विटामिन D का स्तर सामान्य से कम है। इसका सबसे बड़ा कारण यह है कि आजकल ज़्यादातर लोग खुली धूप में पहले जितना समय नहीं बिता पाते।

क्या हर Joint Pain का कारण Vitamin D की कमी होती है?

इस प्रश्न का उत्तर है—नहीं।

Joint Pain के पीछे कई अलग-अलग कारण हो सकते हैं। उम्र बढ़ने के साथ होने वाला ऑस्टियोआर्थराइटिस, रूमेटाइड आर्थराइटिस, यूरिक एसिड बढ़ने से होने वाला गाउट, खेल के दौरान लगी चोट, संक्रमण, ऑटोइम्यून रोग तथा कुछ अन्य पोषण संबंधी कमियां भी जोड़ों के दर्द का कारण बन सकती हैं।

इसी कारण केवल लक्षण देखकर Vitamin D Deficiency का निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता। सही कारण जानने के लिए चिकित्सकीय जांच आवश्यक होती है।

Vitamin D की जांच कैसे होती है?

यदि किसी व्यक्ति को लंबे समय से जोड़ों, हड्डियों या मांसपेशियों में दर्द बना हुआ है, तो डॉक्टर रक्त जांच कराने की सलाह दे सकते हैं।

इस जांच को 25-Hydroxy Vitamin D [25(OH)D] Test कहा जाता है। यही जांच शरीर में Vitamin D के वास्तविक स्तर का सबसे विश्वसनीय संकेत देती है।

रिपोर्ट के आधार पर डॉक्टर यह तय करते हैं कि व्यक्ति में कमी है या नहीं और यदि है, तो उसकी गंभीरता कितनी है।

Vitamin D की कमी पूरी कैसे की जाती है?

यदि जांच में कमी की पुष्टि हो जाती है, तो डॉक्टर व्यक्ति की उम्र, वजन, स्वास्थ्य स्थिति और कमी के स्तर के अनुसार Vitamin D सप्लीमेंट की सलाह देते हैं।

इसके साथ-साथ नियंत्रित मात्रा में नियमित धूप लेना भी महत्वपूर्ण माना जाता है। सुबह या शाम की हल्की धूप कई लोगों के लिए लाभदायक हो सकती है, हालांकि धूप से Vitamin D बनने की क्षमता त्वचा के रंग, मौसम, स्थान, कपड़ों और धूप में बिताए गए समय पर भी निर्भर करती है।

खान-पान में अंडे की जर्दी, वसायुक्त मछली, फोर्टिफाइड दूध, फोर्टिफाइड डेयरी उत्पाद और कुछ फोर्टिफाइड अनाज Vitamin D के अच्छे स्रोत माने जाते हैं। पर्याप्त कैल्शियम का सेवन भी उतना ही जरूरी है, क्योंकि Vitamin D और कैल्शियम मिलकर हड्डियों को मजबूत बनाए रखते हैं।

क्या बिना जांच के Vitamin D सप्लीमेंट लेना सही है?

कई लोग इंटरनेट या दूसरों की सलाह पर Vitamin D की गोलियां लेना शुरू कर देते हैं। लेकिन यह सही तरीका नहीं है।

Vitamin D एक Fat-Soluble Vitamin है, जिसका अत्यधिक सेवन शरीर में जमा हो सकता है। जरूरत से ज्यादा मात्रा लेने पर रक्त में कैल्शियम का स्तर असामान्य रूप से बढ़ सकता है, जिससे मतली, उल्टी, कब्ज, अत्यधिक प्यास, बार-बार पेशाब आना और गंभीर मामलों में किडनी को नुकसान जैसी समस्याएं हो सकती हैं।

इसीलिए Vitamin D सप्लीमेंट हमेशा डॉक्टर की सलाह और आवश्यकता पड़ने पर जांच के आधार पर ही लेना चाहिए।

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Written by

shiv seo

Ayurvedic Specialist · Shree Vishwshraddha Chikitshalaya, Prayagraj

Practising classical Ayurveda at Shree Vishwshraddha Chikitshalaya since 2008 — combining time-tested protocols like Ksharsutra and Panchakarma with modern clinical care for lasting, side-effect-free results.

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